Monday, 18 March 2013

Some of my facebook posts

Facebook authority deleted my so called controversial posts. So from now i am having the back up of same.

ड्राइविंग करने की उम्र 18 साल तो सेक्स की 16 साल क्यों ?
कितनी मूर्खतापूर्ण तुलना है ये ।
ड्राइविंग में हमारी गलती से दूसरों की गांड फट सकती है, लंड कट सकता है,लेकिन आपके पड़ोस में अगर 16 साल के लड़का-लड़की सेक्स कर रहें है तो अपनी गांड बिलकुल नही फटेगी, इसकी फुल गारंटी में लेता हूँ । इसलिए इसका विरोध करने की आवश्कता नही है क्योंकि ये एक निहायत ही व्यक्तिगत मामला है और एक नेसर्गिक चीज है । 

अगर भगवान ने हमें 16 की उम्र में सेक्स करने के लिए capable बनाया है तो इसका विरोध करना, भगवान का विरोध करने के सामान है ।

अपर्लिखित तुलना दैनिक जागरण के सम्पादकीय में की गई है । 
जिस देश में सम्पादकीय लेख भी लोकप्रिय धारणायों के आधार पर लिखे जाते है, उस देश में चुतिया लोग हमेशा चूत का विरोध करते रहेंगे ।

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योन के प्रति हमारा जो attitude है वो इतना सड़ा हुआ है कि इसे बदलने की जरुरत है ।
कुछ दोस्तों को मेरा इस विषय पर लिखना नागवार गुजरता है और वो नाक-भों सिकोड़कर कहते है-
"कुछ चीजें उजागर करने की नही, सिर्फ परदे के पीछे करने की होती है ।"
ऐसा क्यों? पूछने पर वो ऐसा face बनाते है जैसे वो बहुत बड़े पंडित है और मैंने उनसे कोई मूर्खतापूर्ण प्रश् पूछ लिया हो । 
They are orthodox bitch.

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इंडिया टुडे कॉन्क्लेव में अरूण पूरी के पूछने पर मोदी ने कहा हमारी(भारत की) सबसे बड़ी समस्या हमारा mindset है, सबसे बड़ी समस्या हम खुद हैं । काश अरूण प्रतिप्रश्न करते कि mindset कैसे बदला जाये । प्रभु चावला होते तो ये जरुर पूछते क्योंकि ये सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है ।
121 करोड़ लोगों का mindset बदलना असंभव है, इसलिए PM चाहे भगवान को बना दो, देश नही बदलने वाला । 
I think Mr Modi can make just a little difference.

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भगवान की मूर्ति द्वारा दूध पीने, आंसू आने की अफवाहें तो काफी सुनी हैं ।
काश किसी दिन मंदिर में शिवलिंग और पार्वती योनि की कामक्रीड़ा की अफवाह भी सुनाने को मिले 

या शिवलिंग हस्तमेथुन हुए पकडे जाएँ और निशान्तान दपंती उसके वीर्य का तिलक लगाकर पुत्र की कामना करें ।

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हमारा बछड़ा(Calf) अपनी माँ (गांय )के साथ सेक्स करने की कई असफल कोशिशे कर चूका है ।
अगर स्वतंत्र सोच का नाम आधुनिकता है तो हमारा बछड़ा किसी भी इन्सान से ज्यादा आधुनिक है ।

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मैं पूनम पाण्डेय, सन्नी लियॉन जैसी बहादुर महिलायों की भी उतनी ही इज्जत करता हूँ जीतनी मदर टरेसा या लक्ष्मी बाई की ।

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शिक्षित होने बावजूद स्त्रियाँ समर्पण और सुरक्षा की खोज में रहती हैं । वे आज़ादी को महत्व नही देती । 

- किरण बेदी ( किताब- गलती किसकी...)

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As a man get older, his sex instincts travel from his middle to his head.

A very first sentence in novel "The Company of Women" by Khushawant Singh.

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हम अपनी आय का कितना % साहित्यिक किताबों पर खर्च करते हैं ?
जिसका ये % जितना ज्यादा होगा, वो उतना ही ज्यादा समझदार होगा ।
शायद ये समझदारी का पैमाना हो सकता है ।

और मंदिर में दान, प्रसाद आदि के खर्च को मुर्खता का पैमाना माना जा सकता है ।

यदि ये खर्च 360 रूपये /वार्षिक {12x30(10प्रसाद +10दान +10पेट्रोल)}माना जाये और इन पैसों से एक किताब खरीदी जाये तो इस प्रकार हम दस साल में 10 किताबें खरीद सकते हैं । और 10 किताबें किसी की भी जिंदगी बदलने के लिए काफी हैं । फिर हमें किसी भगवान की आवश्कता नही होगी और न ही देश को बदलने के लिए किसी मोदी/राहुल की तरफ देखना पड़ेगा ।

यदि हम ऐसा करते हैं तो दस साल में देश बदल सकता है और नही करते तो देश का प्रधानमंत्री चाहे भगवान को बना दें, कुछ नही बदलने वाला ।

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"Man fuck the woman."
इस वाक्य में man subject (कर्ता) है और woman object. और इसी बात पर तो ऐतराज है की women object नही हैं । 
Fucking is a mutual act (intercourse) in which both man and women are subject.
भाषाओँ ने भी महिलायों के साथ अन्याय किया है।

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अगर तलाक का केस हो तो हमारा कानून पति से पत्नी को मुवावजा दिलवाता है ।पत्नी यदि अपने पैरों पर नही है तो असमें पति का क्या दोष, पति उसका जीवन साथी है, न कि उसका पालनहार। तो पति मुवावजा क्यों देगा??

उसके पालनहार उसके पेरेंट्स हैं जो उसकों सम्पति में उसका हक नही देते और न ही उसे पड़ा लिखा कर इस लायक बनाते हैं कि वो आर्थिक रूप से स्वतंत्र हो । वो सिर्फ उसको पराया धन समझते हैं । पेरेंट्स से उसको उसका हक दिलवाना चाहिए, न कि पति से मुवावजा |

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जीवन का आखिरी उदेश्य आनंद प्राप्त करना है और ये बात जानवर हमसे बेहतर ढंग से समझते हैं ।

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हम जैसे-जैसे अध्ययन करते जाते हैं , वैसे-वैसे हमें अपनी मुर्खता का आभास होता जाता है ।

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मंदिरों की भीड़ और पुस्तकालयों का सूनापन ही भारत की सबसे बड़ी प्रॉब्लम है ।

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मीडिया का सबसे प्रिय शब्द है- 'आम आदमी' 
और आम आदमी का प्रिय शब्द- 'टाइम पास' ।

मीडिया के लिया आम आदमी TRP है,
आम आदमी के लिए मीडिया टाइम पास है ।

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केला खाकर छिलका पडोसी के घर के सामने फेंकने वालों के इस देश में अस्वच्छता के लिया सरकार को दोष देना इस बात का परिचायक है कि यदि हम सड़क किनारे टट्टी करते है तो इसकी दोषी सरकार है और मीडिया अपने पाठकों से सच बोलने से डरता है क्योंकि ये इनके सरकुलेशन और TRP का सवाल है | यह शर्म का विषय है

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भारत में मंदिर बहुत पैसा कमा रहे हैं | हमे भगवान को एक्सपोर्ट करना चाहिए और विदेशों में भी ब्रांच खोलनी चाहिए |