Friday, 4 January 2013

बच्चे पैदा करने के लिए लाइसेंस लेना जरुरी कर देना चाहिए...


जिस प्रकार ड्राइविंग लाइसेंस देने से पहले ये परखा जाता है कि क्या प्रार्थी की ड्राइविंग दूसरों के लिए जानलेवा तो नही होगी, क्या वो इसके लिए सक्षम है ।
इसी प्रकार बच्चे पैदा करने का लाइसेंस तभी दिया जाना चाहिए जब ये तय हो जाये कि प्रार्थी ये जिम्मेदारी उठाने में सक्षम है । जब हर  जिम्मेदारी की योग्यता तय है तो इसकी क्यों नही । आखिर  बच्चे पैदा करना भी तो एक बड़ी जिम्मेदारी है  |

कुछ लोग सोचते हैं ये प्राकृतिक अधिकार है । प्राकृतिक अधिकार तो नंगे रहना भी है । प्रकृति तो इन्सान को अपनी माँ के साथ सेक्स करने से भी नही रोकती ।

इस समाज को सुविधाजनक रूप से चलने के लिए नियम कानून बनाये जाते है ।
नियम कानून  social interest के लिए बनाये  जाते  हैं जिसमे individual interest की हानि होती  है । यदि किसी individual interest से social interest की क्षति होती होती है तो social interest को तवज्जो देते हुए ऐसे individual interest को निषेध किया जाता है । बच्चे पैदा करना एक individual interest है और इससे social interest की क्षति (special case में ) किस प्रकार होती  है कुछ उदाहरण :-

1.केला खाकर छिलका पडोसी के घर के सामने फेंकना। ये हमारे संस्कार हैं और असुविधा पडोसी को और सभी राहगीरों को |

2. मार्किट में अतिक्रमण से बचते हुए, रोड पर चलते हुए, किसी गाड़ी से दुर्घटना होने पर सजा -गाड़ी वाले को और राहगीर को । और गलती-  अतिक्रमण करने वाले के पेरेंट्स की जो अपने बच्चों को इस लायक नही बना सके कि वो लीगल रूप से काम करके अपना पेट ही पाल सके | कारण– पेरंट्स खुद ही इतने सक्षम नही थे | तो फिर वही बात जब सक्षम नही  थे तो बच्चे क्यों पैदा किये ?.गलती किसी की सजा किसी को |

3.उन बच्चों का क्या दोष है जो इतनी ठण्ड में नंगे बदन रेलवे स्टेशन पर सोते है | क्या ये जीवन उनके लिए सजा नही है? ये सजा किसने दी ?

4.ये धरती सिर्फ इंसानों की नहीं है । सभी जीवों का इसपर बराबर हक़ है । आवारा जानवरों के चरने के लिए जो समलात भूमि निर्धारित है उस पर भी इंसानों ने अतिक्रमण कर रखा है । उन बेजुबान पशुवों का क्या दोष जो अपनी भूख मिटने के लिए  किसी खेत में घुस जाते है और खेत का मालिक उनकी गांड में मिर्ची दाल देता है |


उदारहण बहुत हैं जिसमे इन्सान की वक्तिगत मज़बूरी, रूचि, अक्षमता, अज्ञानता दूसरों  के लिए जानलेवा साबित होती  है  |
मज़बूरी का कारण है अपना वंश चलने की परंपरा | दूसरों का वंश जाये भाड़ में  |

Thursday, 3 January 2013

हमें औरतों के ऊपर कूदने के सिवाय कुछ नही आता


हमारे आचरण में पेरेंट्स के दिए गए संस्कार झलकते हैं। संस्कार सोच में बदलते हैं, सोच एक्शन में और हमारे एक्शन ही हमारा भविष्य और चरित्र निर्धारित करते हैं ।
इस नजरिये से देखा जाये तो बलात्कारियों से ज्यादा दोषी उनके पेरेंट्स हैं जिन्होंने अपने बच्चों को संस्कार नही दिए । ज्यादातर बच्चें ऐसे पलते हैं जैसे गली के आवारा कुत्ते पल जाते है । जो इन्सान अपने बच्चों की सही परवरिश नही कर सकता वो बच्चें पैदा क्यों करता है । ये शोध का विषय है ।

पिछले एक पखवाड़े से पूरा देश एक जज और अदालत की भूमिका में है । संस्कार देने की भूमिका कोई नही निभाता । टीवी देखते हुए, चाय की चुस्कियां लेते हुए, फंसी दे दो, नपुंसक बना दो आदि चिल्लाते हुए, क्या किसी पेरेंट्स ने अपने लड़के को पास बुलाकर ये बताने की जहमत उठाई की ये गलत है और क्यों गलत है । क्या हमारे पेरेंट्स ने हमें महिलायों/लड़कियों की इज्जत करना सिखाया है । बच्चों को इन्सान की तरह नहीं हथियार की तरह पाला जाता है। ये बच्चे बड़े होकर एटम बम बन जाते है और जब ये बम फूटते है तो निर्दोष लोगों को इसकी सजा भुगतनी पड़ती हैं । और हमारा कानून हथियार को बनाने वालों की बजाय हथियार को सजा देता है । बोल मूवी का एक डायलाग  है -अगर किसी की जान लेना गुनाह है तो बच्चे पैदा करना भी गुनाह हो सकता है । जो इन्सान अपने बच्चों की सही परवरिश नही कर सकता, वो बच्चे पैदा करके गुनाह करता हैं । इसलिए सजा बच्चों के साथ-साथ उनके पेरेंट्स को भी मिलनी चाहिए । नर्वे देश में ऐसा कानून है । यदि नर्वे का कानून हमारे देश में लागु करें तो लगभग पूरा देश क्रिमिनल बन जायेगा । हम सब क्रिमिनल हैं और हम सबने इसमें अपना अपना योगदान दिया है ।

मर्दों को औरतों के ऊपर कूदने के सिवाय और औरतों को टांग उठाने के सिवाय कुछ नही आता । और इस इंटरकोर्स में जो बच्चें पैदा होते हैं वो बच्चें नहीं, हादसे होते हैं और जब तक ऐसे हादसे होते रहेंगे, दिल्ली जैसे हादसे भी होते रहेंगे ।