हमारे आचरण में पेरेंट्स के दिए गए संस्कार
झलकते हैं। संस्कार सोच में बदलते हैं, सोच एक्शन में
और हमारे एक्शन ही हमारा भविष्य और चरित्र निर्धारित करते हैं ।
इस नजरिये से देखा जाये तो बलात्कारियों से
ज्यादा दोषी उनके पेरेंट्स हैं जिन्होंने अपने बच्चों को संस्कार नही दिए । ज्यादातर
बच्चें ऐसे पलते हैं जैसे गली के आवारा कुत्ते पल जाते है । जो इन्सान अपने बच्चों
की सही परवरिश नही कर सकता वो बच्चें पैदा क्यों करता है । ये शोध का विषय है ।
पिछले एक पखवाड़े से पूरा देश एक जज और अदालत
की भूमिका में है । संस्कार देने की भूमिका कोई नही निभाता । टीवी देखते हुए,
चाय की चुस्कियां लेते हुए, फंसी दे दो, नपुंसक बना दो आदि चिल्लाते हुए, क्या किसी पेरेंट्स ने अपने लड़के को पास बुलाकर ये बताने की
जहमत उठाई की ये गलत है और क्यों गलत है । क्या हमारे पेरेंट्स ने हमें महिलायों/लड़कियों की इज्जत करना
सिखाया है । बच्चों को इन्सान की
तरह नहीं हथियार की तरह पाला जाता है। ये बच्चे बड़े होकर एटम बम बन जाते है और जब ये
बम फूटते है तो निर्दोष लोगों को इसकी सजा भुगतनी पड़ती हैं । और हमारा कानून हथियार
को बनाने वालों की बजाय हथियार को
सजा देता है । बोल मूवी का एक डायलाग है -अगर किसी की
जान लेना गुनाह है तो बच्चे पैदा करना भी गुनाह हो सकता है ।
जो इन्सान अपने बच्चों की सही परवरिश नही कर सकता, वो बच्चे पैदा करके गुनाह करता हैं । इसलिए सजा बच्चों के साथ-साथ उनके पेरेंट्स को भी मिलनी चाहिए
। नर्वे देश में ऐसा कानून है । यदि नर्वे का कानून हमारे देश में लागु करें तो लगभग पूरा देश क्रिमिनल बन जायेगा
। हम सब क्रिमिनल हैं
और हम सबने इसमें अपना अपना योगदान दिया है ।
मर्दों को औरतों के ऊपर कूदने के सिवाय और
औरतों को टांग उठाने के सिवाय कुछ नही आता । और इस इंटरकोर्स में जो बच्चें पैदा होते हैं वो बच्चें नहीं,
हादसे होते हैं और जब तक ऐसे हादसे होते रहेंगे, दिल्ली जैसे हादसे भी होते रहेंगे ।
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