एक लड़की के सबसे बड़े दुश्मन उसके पेरेंट्स होते हैं...
कल्पना चावला की उड़ान चाँद के पार पहुंची । क्या ये पुरुष प्रधान समाज उसकी उड़ान को रोक सका ? नहीं ।
क्योंकि चावला के पेरेंट्स ने उसको सपोर्ट किया और उसके पंख नही काटे । इसका मतलब ये है की यदि लड़की और उसके माता-पिता चाहे कि उनकी लड़की आगे बढे तो किसी समाज में इतना दम नही है कि वो एक लड़की को आगे बढ़ने से रोक सके ।
तो फिर लड़कियों के पिछड़ेपन के लिए दोष पुरे समाज को क्यों ? समाज का तो काम ही टांग खींचना है फिर चाहे वो लड़का हो या लड़की। आखिर अपने बच्चों की सही परवरिश और उनको आगे बढाने की जिम्मेवारी पेरेंट्स की ही तो है ।
परन्तु इसके विपरीत लड़कियों के पांवों में बेड़ियाँ डालने वाले पहले शख्स लड़की के पेरेंट्स ही होते हैं, और इसके लिए उनके पास सिर्फ एक ही तर्क होता है - लोग क्या कहेंगे ???
अगर कल्पना के पेरेंट्स ने सोचा होता कि स्पेस यान में सिर्फ मलंग ही मलंग(पुरुष) हैं और हमारी लड़की अकेली इतने मलंगों के साथ चाँद पर जाएगी तो लोग क्या कहेंगे???, तो कल्पना चावला भी आज 80% पतिव्रता भारतीय नारियों की तरह गोबर के उपले और बितोड़े बना रही होती ।
एक लड़की के सबसे बड़े दुश्मन उसके पेरेंट्स होते हैं क्योंकि यही वो लोग हैं जो उसको कैद करके रखते हैं । और इस कैद से बाहर आने का रास्ता शोएब मंसूर की मूवी "बोल" में कैद है ।