मैं भगवान हूँ !
भारतियों से परेशान हूँ !!
साले खुद कुछ कर नहीं सकते मेरी गांड में डंडा रखते हैं मेरा ये काम कर दो मेरा वो काम कर दो|
रिश्वतखोर मुझे भी रिश्वत देकर (प्रसाद, दान आदि) पटाना चाहते हैं|
बहरहाल मैं कोई ऐसी सुपर पावर नहीं हूँ की तुम 10 रूपये का प्रसाद मंदिर में चढाओगे और मैं तुम्हारे सभी काम कर दूंगा|
न तो तुम्हारा प्रसाद मेरे पास पहुंचता है और न ही दान किये हुआ पैसे |
मेरे पास पहुँचती है तुम्हारी नियत जो की इतनी सड़ी हुई है कि दुनिया भर का सेंट भी इसकी सड़ांध को कम नही कर सकता |
इन्सान खुद भी जाती, धर्म, स्थान की सीमायों में बंटा हुआ है और और मुझे भी मंदिर मस्जिदों में बंद कर दिया | और फिर कहता है ये तेरा भगवान ये मेरा भगवान | मेरा भगवान ज्यादा शक्तिशाली, ज्यादा निराकार; तेरा भगवान कुछ भी नहीं | हमारा भी competition करा दिया |
फिर भी कुछ लोगों की नियत अच्छी है |जैसे म.फ. हुसैन जिसने मेरी नंगी पेंटिंग्स बनायीं थी जो मुझे बहुत पसंद आई क्योंकि मैं हमेशा नंगा ही रहता हूँ | कपड़ों का अविष्कार इन्सान ने किया है और मैं इन्सान द्वारा बनाये कपड़ों का मोहताज नहीं हूँ | कपड़ें न पहनना इन्सान के लिए अनैतिक हो सकता है मेरे लिए नहीं | पर इन्सान भी कितना दबंग है मुझ पर भी अपनी नैतिकता थोंपना चाहता है|
इन्सान अपने आप में एक बहुत बड़ा अजूबा है और वह अजूबों की खोज में पता नहीं कहाँ-कहाँ भटकता है | ठीक वैसे ही जैसे मेरी खोज में |
कुछ ज्यादा पढ़े-लिखे लोग कहते है मैं इस जग के कण-कण में विद्यमान हूँ | यदि ऐसा है तो मैं तुम्हारी टट्टी में भी हूँ फिर तुम अपनी टट्टी की पूजा क्यों नहीं करते ? सब की अपनी-अपनी अटकलें है|
खेर अभी चलता हूँ | 121 करोड़ अप्लिकेसन मेरी गांड में 121 डंडों की तरह लटक रही हैं | इन डंडों को निकालते-निकालते परेशान हो गया हूँ |
सभी भारतियों से निवेदन है अपने 3 पौंड के दिमाग का मोलिक उपयोग कीजिये, एन्जॉय कीजिये और मुझे भी करने दीजिये !!!
- God
Sunday, 17 July 2011
Wednesday, 1 June 2011
ताजमहल से बड़ा अजूबा
idea के विज्ञापन में अभिषेक कहता है- मेरी बीवी स्टील इन मुठ्ठी |
ad इस बात का प्रचार करती है कि बीवी एक एक उपभोग कि वस्तु है जिसे मुठ्ठी में ही रखना चाहिए | ताकि कोई गैर मर्द इसका उपभोग करके न चला जाये |
आदित्य बिरला के पास दौलत, सोहरत , पॉवर सबकुछ है,फिर भी ये लोग पैसे के लिए इतना गिर सकते हैं तो एक गरीब निहत्थे आम आदमी से नैतिक बनने की उम्मीद कैसे कि जा सकती है?
दरअसल लगभग सभी प्रसिद्ध लोग अनैतिक काम करके पैसा कमाते हैं,सफल हो जाते है. और फिर यही लोग किताबों में आदर्श की तरह पढाए जाते हैं. पैसे के ढेर पर बैठकर ये लोग हमें कहते हैं पैसा सबकुछ नहीं है, आप आदर्श बनिए | फिर भी कुछ लोग दुनिया भर के कष्टों को सहकर भी नैतिक बने रहते है| यही भारत की महानता है और ताजमहल से बड़ा अजूबा भी | हम इन साधारण लोगों की पीड़ा को उन गहरे अर्थो में नहीं समझ पाते जिन अर्थों में ये असाधारण हो जाते है |
दरअसल अनैतिकता कोई अपराध नहीं है | हम किसी को नैतिक बनने के लिए मजबूर नहीं कर सकते और करना भी नहीं चाहिए | पर यदि आपको लगता है कि आपकी माँ एक उपभोग की वस्तु नहीं है तो आप निचे दिए गए नंबर पर जवाब मांग सकते है और अपनी शिकायत लिखवा सकते है |
Idea Nodal Officer, N Sagar- 9990555555
संतुष्टजनक जवाब न मिलाने पर अपना नंबर पोर्ट करावा सकते है- sms PORT to 1901(toll free)
Monday, 9 May 2011
धन का अध्यात्मिक पहलू
हर इन्सान भीतर से संजीदा होता है. पर भांति-भांति के मुखोटे लगाये बिना ज़िन्दगी की गाडी चलती नहीं. परन्तु जब आप सफल और आर्थिक रूप से सम्पन होते हैं तब पैसा आपको जस का तस उजागर होने की स्वतंत्रता देता है. इस दृष्टि से देखें तो धन के भी अध्यात्मिन पहलू हो सकते हैं. पर कलमाड़ी जैसे उन लोगों का क्या जिनकी संजीदगी तेल लेने गई है.
आम आदमी की दुविधा को समझा जा सकता है, लेकिन सबकुछ होने के बाद भी बेईमान बने रहना समझ से परे है.
आम आदमी की दुविधा को समझा जा सकता है, लेकिन सबकुछ होने के बाद भी बेईमान बने रहना समझ से परे है.
Wednesday, 13 April 2011
Sunday, 10 April 2011
सेक्स का शरीर से क्या रिश्ता?
सदियों से हम ये भरम पाले बैठें हैं कि सेक्स शरीर में है, नदियों जैसे बहाव में है.
दरअसल ऐसा नहीं है. सेक्स हमारे दिमाग में है.
कई बार पलकों के उठने-गिरने से वो बात पैदा होती है जो पुरे कपड़े उतारने पर भी नहीं होती.
ये पूरा मामला दिमाग, फंतासी और कल्पना का है.
दरअसल ऐसा नहीं है. सेक्स हमारे दिमाग में है.
कई बार पलकों के उठने-गिरने से वो बात पैदा होती है जो पुरे कपड़े उतारने पर भी नहीं होती.
ये पूरा मामला दिमाग, फंतासी और कल्पना का है.
Wednesday, 23 March 2011
हर मुस्कराहट चैक की तरह होती है, जवानी उम्र की बसंत बहार होती है, चतुर लकड़ियाँ उम्र की मेहरबानियों को भविष्य निधि में बदलना जानती हैं और ऐसी साधवानी नहीं बरतने पर एक वक़्त आता है जब उम्र के बैंक में जावानी का खाता कमजोर होने लगता है, मुस्कराहटों के चैक बाउंस होने लगते और जिंदगी धारा 138 का केस बनकर अदालत जा पहुंचती हैं.
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