सदियों से हम ये भरम पाले बैठें हैं कि सेक्स शरीर में है, नदियों जैसे बहाव में है.
दरअसल ऐसा नहीं है. सेक्स हमारे दिमाग में है.
कई बार पलकों के उठने-गिरने से वो बात पैदा होती है जो पुरे कपड़े उतारने पर भी नहीं होती.
ये पूरा मामला दिमाग, फंतासी और कल्पना का है.
दरअसल ऐसा नहीं है. सेक्स हमारे दिमाग में है.
कई बार पलकों के उठने-गिरने से वो बात पैदा होती है जो पुरे कपड़े उतारने पर भी नहीं होती.
ये पूरा मामला दिमाग, फंतासी और कल्पना का है.
No comments:
Post a Comment
place your comments here...
Note: only a member of this blog may post a comment.